Wednesday, November 12, 2008

कभी कभी मैं ..


मैं कभी कभी सोचने लगता हूँ............

Monday, November 10, 2008

याद आएगी दादा कि दादागिरी.............



अपने पहले अंतरराष्ट्रीय दौरे में ही सिर्फ एक 'ना' के कारण दुनिया भर की नजरों में हठी और घमंडी बनने वाले सौरव गांगुली अपनी अदम्य इच्छाशक्ति से न सिर्फ 'ऑफ साइड' के भगवान और देश के सबसे सफल कप्तान बने बल्कि उन्होंने तमाम विपरीत परिस्थितियों में वापसी का जज्बा दिखाकर दुनिया भर के क्रिकेटरों और खेल प्रेमियों को अपना कायल भी बनाया।
गांगुली यानी महाराज को कुछ ने भले ही नकारात्मक रूप में पेश करने की कोशिश की हो लेकिन बाएं हाथ यह बल्लेबाज वास्तव में क्रिकेट का महाराज था जिन्होंने भारतीय क्रिकेट को उस मुकाम पर पहुंचाया जिसकी उनके आगमन से पहले सिर्फ कल्पना की जाती थी। बाएं हाथ के इस बल्लेबाज को लेकर कई सवाल उठते रहे लेकिन कोई इस बात को नहीं नकार सकता कि वह भारत के सबसे सफल कप्तान है। भारत को दूसरी टीमों में आतंक पैदा करने वाली टीम उन्होंने बनाया तथा एक दिवसीय क्रिकेट के वह सर्वकालिक महान बल्लेबाजों में हमेशा शामिल रहेंगे।
कोलकाता के महाराज आस्ट्रेलिया के खिलाफ नागपुर में आज चौथे टेस्ट मैच में आखिरी बार अंतरराष्ट्रीय मैच में खिलाड़ी के तौर पर मैदान पर दिखे। इसके साथ ही भारतीय क्रिकेट के एक स्वर्णिम अध्याय का भी अंत हो गया जिसमें इस महान बल्लेबाज ने कई उपलब्धियां हासिल की, कई उतार-चढ़ाव देखे और कई विवादों से उनका वास्ता पड़ा। गांगुली ने अपने कैरियर में 113 टेस्ट मैच की 188 पारियों में 42.17 की औसत से 7212 रन बनाए जिसमें 16 शतक और 35 अर्धशतक शामिल है। इसके अलावा 311 एक दिवसीय मैचों की 300 पारियों में उन्होंने 41.02 की औसत से 11363 रन बनाए है जिसमें 22 शतक और 72 अर्धशतक शामिल है।
गांगुली को 1992 में आस्ट्रेलियाई दौरे पर गई भारतीय टीम में जगह दी गई जहां उन्होंने वेस्टइंडीज के खिलाफ ब्रिस्बेन में 11 जनवरी को अपना पहला एक दिवसीय मैच खेला लेकिन 12वें बल्लेबाज की भूमिका निभाने से इंकार करने के कारण उन पर हठी होने के आरोप लगे और अगले चार साल तक यह सितारा घरेलू क्रिकेट में खो गया। यह वह दौर था जब यह खिलाड़ी लोगों के लिए भले ही गुमनामी के अंधेरे में खो गया लेकिन वास्तव में वह जोरदार वापसी की तैयारियों में जुटा था। इसी के बाद क्रिकेट जगत पहली बार गांगुली के जज्बे और इच्छाशक्ति से परिचित हुआ।
गांगुली ने 1993 से 1995 तक रणजी ट्राफी में शानदार प्रदर्शन किया तथा 1995-96 में दिलीप ट्राफी में 171 रन की पारी से इंग्लैंड जाने वाली टीम में जगह बनाई। उन्होंने ला‌र्ड्स में पहला टेस्ट मैच खेला। महान अंपायर डिकी बर्ड जब अपने अंतिम टेस्ट मैच के लिए उतर रहे थे तब दो दिग्गज बल्लेबाज गांगुली और राहुल द्रविड़ ने टेस्ट क्रिकेट में पदार्पण किया। बाद में द्रविड़ ने गांगुली के बारे में कहा था, 'ऑफ साइड में पहले भगवान है और उसके बाद गांगुली।' गांगुली ने इस मैच में 131 रन बनाए जो ला‌र्ड्स में टेस्ट पदार्पण पर अब भी उच्चतम स्कोर है। उन्होंने फिर ट्रेंटब्रिज में 136 रन की लाजवाब पारी खेली।
'दादा' के नाम से भी मशहूर गांगुली वर्ष 2000 में कप्तान बने जिसके बाद भारतीय क्रिकेट का एक नया अध्याय शुरू हुआ और उनके पहले कोच गोपाल बोस ने कहा, 'भारतीय क्रिकेट को आजादी उस दिन मिली थी जब गांगुली ने ला‌र्ड्स में अपनी शर्ट निकालकर घुमाई थी।' गांगुली की सबसे बड़ी उपलब्धि हालांकि भारतीय टीम को पिरोकर उसे विजेता बनाना रहा। उन्होंने 49 मैच में कप्तानी की जिसमें 21 में भारत जीता और इसमें भी 12 मैच उसने विदेशी धरती पर जीते। गांगुली की अगुवाई में भारत ने आस्ट्रेलिया और पाकिस्तान को उसकी सरजमीं पर हराया। भारत ने 2001 में जब आस्ट्रेलिया को अपनी सरजमीं पर सीरीज में हराया था तो गांगुली ही कप्तान थे।
यह भी संयोग है कि गांगुली की सिफारिश पर चैपल को कोच बनाया गया जिनके कारण आखिर में न सिर्फ उनकी कप्तानी छिनी बल्कि वह भारतीय टीम से भी बाहर हुए। 2005 के बाद उनके लिए संघर्ष भरे दिन रहे। उन्हें टीम से अंदर बाहर किया जाता रहा और 2006 में तो उन्हें लगभग दस महीन वनवास में बिताने पड़े। गांगुली ने 2006 के अंत में ही दक्षिण अफ्रीका में वापसी की और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने 2007 में दस टेस्ट मैचों में 61.44 की औसत से 1106 रन बनाए। इस बीच उन्होंने अपने घरेलू मैदान ईडन गार्डस पर टेस्ट शतक और अपना पहला दोहरा शतक [पाकिस्तान के खिलाफ बेंगलूर में 239 रन] बनाया। यह भी संयोग है कि गांगुली ने नागपुर में अपना अंतिम टेस्ट मैच खेला। यही वह शहर है जहां चार साल पहले आस्ट्रेलिया के खिलाफ विभिन्न कारणों से वह नहीं खेले थे।
गांगुली के कैरियर का घटनाक्रम:
जनवरी 1992 - वेस्टइंडीज के खिलाफ ब्रिसबेन में एक दिवसीय क्रिकेट में पदार्पण। तीन रन बनाकर आउट और टीम से बाहर।
जून 1996 - इंग्लैंड के खिलाफ ला‌र्ड्स में पदार्पण टेस्ट में ही शतक जमाया। ट्रेंट ब्रिज में अगले टेस्ट मैच में भी शतक जमाया।
अगस्त 1997 - कोलंबो में श्रीलंका के खिलाफ एक दिवसीय मैचों में अपना पहला शतक जमाया।
सितंबर 1997 - पाकिस्तान के खिलाफ सहारा कप में भारत की 4-1 से जीत में सर्वाधिक रन बनाने और विकेट लेने वाले खिलाड़ी। गांगुली ने 55.5 की औसत से 222 रन और 10.66 की औसत से 15 विकेट लिए। उन्हें चार मैच में मैन ऑफ द मैच और मैन ऑफ द सीरीज चुना गया।
नवंबर-दिसंबर 1997 - श्रीलंका के खिलाफ तीन मैचों की घरेलू सीरीज में मैन ऑफ द सीरीज। उन्होंने 98.00 की औसत से 392 रन बनाए।
मई 1999 - श्रीलंका के खिलाफ विश्व कप मैच में टांटन में 183 रन बनाए जो उस समय एक दिवसीय मैचों में किसी भारतीय का सर्वाधिक स्कोर था।
सितंबर 1999 - सचिन तेंदुलकर के चोटिल होने के कारण हटने से सिंगापुर चैलेंज में पहली बार एक दिवसीय मैचों में भारत की कप्तानी की।
फरवरी 2000 - लंकाशर से जुड़े।
फरवरी 2000 - तेंदुलकर के कप्तानी पद से इस्तीफे के बाद दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ पांच वनडे मैचों की सीरीज के लिए कप्तान नियुक्त।
मार्च 2001 - भारत को आस्ट्रेलिया पर अपनी सरजमीं में 2-1 से ऐतिहासिक जीत दिलाई।
नवंबर 2001 - गांगुली और पांच अन्य भारतीयों को पोर्ट एलिजाबेथ टेस्ट के दौरान मैच रेफरी माइक डेनेस ने अधिक अपील करने के लिए आगाह किया। एक टेस्ट मैच और पांच एक दिवसीय मैचों का निलंबित प्रतिबंध लगाया।
जुलाई 2002 - भारत की नेटवेस्ट सीरीज फाइनल में जीत के बाद ला‌र्ड्स की बालकनी में शर्ट निकालकर लहराई।
मार्च 2003 - भारतीय टीम को विश्व कप फाइनल तक पहुंचाया।
अप्रैल 2004 - पाकिस्तान में टेस्ट सीरीज जीतने वाले पहले भारतीय कप्तान बने। इसके साथ ही 15 टेस्ट जीत के साथ भारत के सबसे सफल कप्तान बने।
अक्टूबर 2004 - भारत ने 35 साल बाद आस्ट्रेलिया से घरेलू सीरीज गंवाई।
मार्च 2005 - पाकिस्तान के खिलाफ घरेलू सीरीज ड्रा करवाई।
अप्रैल 2005 - पाकिस्तान के खिलाफ एक दिवसीय सीरीज के दौरान धीमी ओवर गति के लिए छह मैच का प्रतिबंध। भारत सीरीज 2-4 से हारा।
सितंबर 2005 - जिम्बाब्वे में खुलासा किया कि कोच ग्रेग चैपल ने उनसे कप्तानी छोड़ने के लिए कहा था।
नवंबर 2005 - टेस्ट कप्तानी के पांच साल के कार्यकाल का अंत। राहुल द्रविड़ नए कप्तान बने।
जनवरी 2006 - पाकिस्तान के खिलाफ टेस्ट सीरीज के लिए चुने गए।
दिसंबर 2006 - दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ टेस्ट सीरीज में वापसी। सर्वाधिक रन बनाने वाले बल्लेबाज।
जनवरी 2006 - एक दिवसीय मैचों में वापसी। वेस्टइंडीज के खिलाफ पहले मैच में ही 98 रन बनाए।
जुलाई-अगस्त 2007 - इंग्लैंड के खिलाफ भारत की जीत में 49.80 की औसत से 249 रन बनाए।
नवंबर-दिसंबर 2007 - पाकिस्तान के खिलाफ तीन टेस्ट मैचों की सीरीज में सर्वाधिक 534 रन बनाए। मैन ऑफ द सीरीज बने। पहली बार अपने घरेलू मैदान ईडन गार्डस पर शतक जड़ा। बेंगलूर में अगले मैच में पहला दोहरा शतक बनाया।
दिसंबर 2007 से जनवरी 2008 - आस्ट्रेलिया के खिलाफ मिश्रित सफलता। दो अर्धशतक 29.37 की औसत से रन बनाए। एक दिवसीय टीम से बाहर।
अक्टूबर 2008 - आस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट सीरीज के बाद संन्यास लेने की घोषणा की।
दस नवंबर 2008 - आस्ट्रेलिया के खिलाफ नागपुर में अपने कैरियर का अंतिम टेस्ट मैच में खेला। भारत इस मैच को 172 रन से जीता और आठ साल के बाद बोर्डर-गावस्कर ट्राफी पर कब्जा जमाया।
-लेख दैनिक जागरण मे प्रकाशित

Back to Comeback King " Sourav Ganguly"





Sourav Ganguly

The youngest son of Chandidas and Nirupa Ganguly, Ganguly was born on 8 July 1972 in
Kolkata. His father ran a flourishing print business and was one of the richest men in Kolkata. He had a luxurious childhood and was nicknamed the Maharaja. Though he was asked to concentrate on his studies and not to play cricket, he was inspired to do so by his brother Snehasish Ganguly,, an accomplished left-handed batsman for Bengal.. Though he was acutally right-handed, he batted left-handed so that he could use his brother's equipment. After he showed some promise as a batsman, he was enrolled in a cricket academy. An indoor multi-gym and concrete wicket was built at home for him and his brother, and he would often watch cricket videos, especially those of David Gower, whom he admired. After he scored a century against the Orissa U-15 side, he was made captain of St Xavier's School's cricket team, where several of his teammates complained against his arrogance but that arrogance was not actually arrogance but a spirit of lifting team that he showed in his international career as captain of india.
Gifted offside player discarded after one ODI on debut as a teenager in Australia in 1991-92 but made hundreds in his first two Tests on comeback in 1996.
India's most successful Test captain was sacked as one-day player in October 2005 and from Tests four months later but made a strong comeback in South Africa.
He has gone on to become the first Indian left-hander to score 7,000 Test runs during a memorable farewell Test series against Australia.

We will miss DADA – The Maharaja of Indian cricket.

Thursday, November 6, 2008

सूरत टू वडोदरा

सूरत टू वडोदरा
दिन शुक्रवार (२९/१०/२००८)
मैंने अपने सामने बैठे हुए राकेश जी से पूछा
मैं : ये सूरत कितने बजे तक आ जाएगा । राकेश जी : बस यही कोई आधे घंटे का समय लगेगा । इतना कह कर वो अपना सामान ठीक करने लगे , ट्रेन बड़ी तेज़ी से सूरत की ओर दौड़ती चली जा रही थी और मेरी भी बेचैनी बाद रही थी । मैंने अपने मोबाइल मे देखा रात के ९ बज रहे थे , मैं ये सोच रहा था कि सूरत से बडोदा जाने के लिए पता नही कितनी रात मे ट्रेन मिलेगी और मैं न जाने कब बडोदा पहुंचुंगारास्ता भी अनजान था । यही सोचता सोचता मैं ट्रेन कि खिड़की के बहार देखने कि कोशिश कर रहा था , वैसे भी ऐसी से बहार रात मे देखने मे ज़्यादा कोशिश करनी पड़ती है तभी राकेश जी कि आवाज़ मेरे कानो मे पड़ी मनीष जी उधना स्टेशन आ गया है अब आप भी अपना सामान रख लीजिये। मैं: अरे क्या राकेश जी पूरा २७ घंटा हो गया ट्रेन कि सवारी करते करते अभी तक सफर ख़तम नही हुआ। राकेश जी : हाँ मनीष जी आपके साथ तो अच्छा लगा आप नही होते तो बोरियत हो जाती । मैं: अरे कहाँ आपके साथ तो भाभी जी है और आपका बेटा भी है , आप लोग नही होते तो मैं बोर हो जाता वैसे भी आज ट्रेन मे कितने कम लोग हैं। राकेश जी: चलिए अच्छा लगा आप से मिलकर । मैं: मुझे भी । तभी भाभी जी जो अब तक अपने बेटे को सुलाने कि कोशिश कर रहीं थी बोलीं पता नही कब अब मुलाक़ात होगी ................. वैसे ट्रेन का सफर इस मामले मे अच्छा होता है कि कुछ अच्छे दोस्त बन जाते है भले ही केवल कुछ घंटों के लिए। इतना सोच कर मैं तो आराम से बैठ गया लास्ट स्टाप था तो सोचा की आराम सी ही उतरा जाएगा जल्दी किस बात की वैसे भी आराम से बड़कर क्या है ।
कुछ देर बाद मैं भी स्टेशन पर उतर गया गाड़ी प्लेट फॉर्म नम्बर ४ पर रुकी थी पास ही खड़े एक भाई साहब से १ नम्बर प्लेट फॉर्म का पता पूछ कर मैं उस ओर चल दिया ।
प्लेट फॉर्म नम्बर १ पर पहुच कर मैंने वही बुक स्टाल वाले से पूछातो उसने बताया की बस स्टाप पास मे ही है । मैं यह सोच रहा था की बस से बडोदा चला जाऊँ कम से कम बैठने को तो जगह मिल जायेगी । बस स्टाप रेलवे स्टेशन से बस कुछ दूर पर ही था , मैं चल कर वह तक पहुच गया ।
बस स्टाप पर तो बहुत जायद भीड़ थी किसी तरह मैं वडोदरा वाले प्लेट फॉर्म पर पहुँचा तो देखा की वहां वडोदरा जाने वाली कई बसे खड़ी थी । मन ही मन मैं खुश हुआ की रात १२ बजे तक तो वडोदरा पहुच ही जाऊंगा पर जल्द ही पहुच जाऊंगा , पर ये खुशी ज्यादा देर तक नही रही । जल्द ही मुझे पता चल गया की अगर वडोदरा तक बस से जाना है तो पूरे रास्ते खड़े हो कर जाना पड़ेगा । तब तक मैं एक बस मे चढ़ चुका था जैसे ही बस आगे बढ़ी मैं बस से उतर गया ।
रात ९:३८ मिनट मैं दोबारा सूरत रेलवे स्टेशन पर आ चुका था ।
और रेलवे उद्घोसना हुई कि कछ एक्सप्रेस प्लेटफोर्म नम्बर एक पर खड़ी है , मैंने देखा तो टिकेट कि लाइन बहुत लम्बी थी शायद इतनी कि एक घंटे से पहले टिकेट नही मिलती और मैं दौड़ कर प्लेटफोर्म नम्बर एक पर चला गया जैसे ही मैं प्लेटफॉर्म पर पहुँचा मैंने देखा कि कछ एक्सप्रेस ठीक समय से आ चुकी थी और मेरे लिए शायद ये पाहली बार हुआ था कि कोई ट्रेन सही टाइम पर मिली हो ।
मैंने जल्दी जल्दी decide किया कि मैं ट्रेन मे चढ़ जाता हूँ और ट्रेन के अंदर ही टिकेट बनवा लूँगा। और मैं ट्रेन जनरल डिब्बा ढूढ़ते हुए वह तक पंहुचा , पर डिब्बा तियो पुरी तरह से बंद था और तो और कोई खोलने को भी तैयार नही था, मजबूरन मुझे स्लीपर क्लास कि तरफ़ बढ़ना पड़ा ।
स्लीपर क्लास कोच नम्बर ८ के बहार ।
दो आरपीयफ (RPF) के जवान खड़े थे जिसमे से एक थोड़ा ज्यादा उम्र का था ( यही कोई ५५ साल का) और दूसरा अभी जवान ( ४० साल के आस पास) नज़र आ रहा था ।
मैं जैसे ही कोच की तरफ़ बढ़ा।
R P F का जवान ( ५५ वर्स ) : क्या बे कहाँ जा रहा है ।
मैं: सर जी मुझे वडोदरा जाना है ।
R P F का जवान ( ४० वर्स ) : टिकट दिखा ।
मैंने अपनी जेब से वाराणसी टू सूरत ताप्ती गंगा एक्सप्रेस ऐ सी क्लास ३ की टिकट निकला कर दिखाई ।
R P F का जवान ( ५५ वर्स ) :( मुझसे टिकट छिनते हुए ) ये तो सूरत तक की टिकट है । सेल मैं तुझको एलाऊ नही करूँगा ।
मैं: सर जी प्लीज़ जाने दो इसके बाद कोई ट्रेन नही है ।
R P F का जवान ( ५५ वर्स ) : चल दूर हट । इसमे मत जा ।
मैं: देख लो सर जी अगर हो सके तो जाने दो ।
R P F का जवान ( ४० वर्स ) : साहब ने मन किया तो नही जाने का ।
मैं रुक गया और ट्रेन चल पड़ी , अभी ट्रेन ने स्पीड भी नही पकडी थी कि तभी कम उम्र वाले RPF के जवान ने मुझे इशारे से ट्रेन मे चड़ने को बोला । और मैंने दौड़ कर ट्रेन पकड़ ली ।
ट्रेन पर चढाते ही उसने बोला आजा मैं देख लूँगा। मैंने उसको प्यार से धन्यवाद् बोला । मुझे इतने तो पता था कि टिकट चेक करने का हक इनका तो नही है पर कुछ कर भी तो नही सकता था , मेरी समझ से आजकल तो भाई चोर और पुलिस मौसेरे भाई हैं। इनसे जितना बचसका जाए उतना ही अच्छा है ।
दिवाली के बाद ट्रेनों मे बहुत भीड़ हो जाती है , ये तो सबको पता होता है पर क्या किया जाए जरुरी हो सफर करना ही पढता है । मेरे साथ भी यही हुआ था ऊपर से बिल्कुल नया रास्ता कुछ जानकारी भी नही थी ।
मैं कोच मे बहार कि तरफ़ टॉयलेट के पास जहाँ पहले से ही लोग चादर बीचा कर बैठे हुए थे बैठ गया लोग देखने मे भले लग रहे थे सबके पास वेटिंग टिकट थी और मेरे पास कोई टिकट नही । तभी एक मिलिट्री वाले ने मुझसे बोला ।
मिलिट्री अंकल: कहाँ जाना है ।
मैं: वडोदरा
मिलिट्री अंकल: वेटिंग टिकट है
मैं: नही मेरे पास सूरत तक कि टिकट है आगे कि ट्रेन मे बनवा लूँगा ।
मिलिट्री अंकल: कोई जरुरत नही पड़ेगी । टी टी वडोदरा तक नही आएगा ।
मैं: ओके ।
तभी सामने से
आंटी : आप तो ताप्ती गंगा मे थे न ।
मैं : हाँ ।
आंटी: हम भी वाराणसी से आ रहे है , आपको मैंने वह देखा था ।
मैं: ( उनके बड़े से परिवार को देखते हुए बोला ) : अच्छा ।
इसके बाद वो उनके हसबैंड से कुछ बताने लगीं।
आंटी जी के परिवार मे दो मेल मेम्बर , दो फीमेल मेंबर और चार बच्चे थे , उनके अलावा तीन परिवार और वही पर आराम फार्म रहे थे । उनमे से एक अंकल जी उनकी बेटी के लिए कोच के अन्दर बार बार आ जा कर बैठने का प्रबंध कर रहे थे । और वो लड़की यहीं लड़को के बीच रहने का प्रयास कर रही थी और अंततः अंकल हार गए और वो लड़की जीत गई, आजकल के माँ बाप बच्चो से अक्सर हार ही जाते है । लड़की यूँ ही इधर उधर देख रही थी तभी जो का झटका लगा और वो मिलिट्री अंकल पर गिर गई । अब तो उसके फादर से नही रहा गया और उन्होंने जबरदस्ती उसको नीचे बैठने को बोल दिया और वो उसी भीड़ मे बैठ गई , पर शायद उसको अच्छा नही लग रहा था अब लड़को को देखने के लिए जो उसको सर उठाना पड़ रहा था ।
खैर वहीँ दूसरी लड़की भी बैठी थी और दोनों ने बात करनी शुरू कर दी , और अंकल ( लड़की के पापा ) को कुछ शान्ति मिली।
बगल वाले डिब्बे मे बहुत सारे स्टूडेंट्स थे और हर नवजवान ग्रुप कि तरह से शोर मचा रहे थे और वहीँ लेती एक बूढी आंटी उनको डांटने मे लगी थी । मैंने जब उधर देखा तो आंटी ने मेरी ओर देखते हुए बोला इनको देखो सोने नही दे रहे हैं । मेरे पास इस बात कोअ कोई जवाब नही था और मैं पुनः अपने ग्रुप जो आधे से ज्यादा ज़मीन पर बैठ अता उस ओर घूम गया ।
तभी मैंने देखा कि कुछ लोग हमरी तरफ़ आ रहे थे और उनके पीछे वही दो RPF के जवान थे , उनमे से कम उम्र वाले ने मुझे घूरा तो ज्यादा उम्र वाला बोल उठा ।
R P F का जवान ( ५५ वर्स ) : क्या हुआ ।
R P F का जवान ( ४० वर्स ) : कुछ नही साहब ये वही है जिसके पास टिकट नही है ।
R P F का जवान ( ५५ वर्स ) : बुला साले को इधर ।
R P F का जवान ( ४० वर्स ) : चलो साहब बुला रहे हैं ।
और दोनों चल पड़े , उनके साथ जितने भी लोग थे या तो वो बिना टिकट थे या उनका रेसेवेशन नही था ।
मैं: ( नीचे देखते हुए) आता हूँ।
मिलिट्री अंकल : साले पैसे वसूलेंगे।
तभी मैंने कुछ हिज़डो को आते देखा , ये हिज़दे भी न जाने क्यों ट्रेन मे ही वसूली करने चले आते हैं?
एक हिज़डा ( मुझे से) : ऐ राजा कुछ देना ।
मैं इनका इतजाम पहले से ही कर के चलता हूँ पाँच का नोट ऊपर वाली जेब मे ।
मैंने पाँच को नोट उनकी तरफ़ बढाया पर वो इतने पर नही मन और कस के मेरे गालों को खीच लिया । मुझे इस बात का एहसास लंबे समय तक गलों मे दर्द के साथ होता रहा ।
हिज़दों ने खैर सब से कुछ न कुछ वसूली की और चले गए, उसके बाद मेरे साथ मे बैठे हुए बैसहब मे कुछ पुराणी कहानी सुनानी सुरु की । कि एक बार कैसे उनके दोस्तों ने और उन्होंने मिलकर हिज़डो को परेशां कर लिया था ।
ऐसा खैर हमेशा ही होता है कि कोई न कोई हिज़डो के जाने के बाद ही अपनी मर्दानगी दिखता है ।
मैंने आपनी पर्स से सारे पैसे निकले और अलग कर के रख लिए , अब पर्स मे केवल १७० रुपये बचे थे । मैंने मिलिट्री अंकल को मेरा सामान देखने को बोला और RPF वालों से मिलने चल दिया ।
अब हम वहा थे जहाँ से स्लीपर कोच ख़तम होता था और आगे का रास्ता बंद था ।
R P F का जवान ( ५५ वर्स ) : क्यों चढा तूमैंने मन किया था न।
मैं: वो मैं सर जी से पूछ कर चढा था ( दूसरे वाले RPF के जवान कि तरफ़ मैं इशरा करते हुए बोला)
R P F का जवान ( ५५ वर्स ) : वो कौन हैं? मुझ से पूछना था न ।
मैं: सॉरी सर जी ।
क्या करता जब काम हो तो गधे को भी सर पर चढाना पड़ता है , यही सोच कर मैं सर जी सर जी बोले जा रहा था और वो मुझ पर चढाते जा रहा था ।
R P F का जवान ( ५५ वर्स ) : साली आगे भरूच मे तेरे को थाने मे दे दूंगा तभी साले समझ आएगी ।
R P F का जवान (४० वर्स ) : जाने दो साहब बच्चा है।
R P F का जवान ( ५५ वर्स ) : क्या बच्चा है । एक तो बिना टिकट है ऊपर से स्लीपर मे चल रहा है ।
मेरी तरफ़ घूरते हुए वो बोला ..........
R P F का जवान ( ५५ वर्स ) : एक झापड़ मरूँगा दिमाग सही हो जाएगा और ट्रेन का सफर हमेश एके लिए भूल जाएगा ।
अब तो मेरा खून खौल रहा था , मन मे आ रहा था साले को ट्रेन से धकेल दूँ , मैं इतनी देर से सर जी सर जी बोले जा रहा था और वो मुझे मरने कि बात करने लगा था । खैर मैंने खुद को बहुत कंट्रोल किया , और कुछ नही बोला ।
मैं: सर जी वैसे तो मेरे पास सूरत तक का टिकट है , और मैं टी टी से मिलकर आगे बढ़वा लूँगा , रेलवे मे तो ये नियम है ।
R P F का जवान ( ४० वर्स ) : साले हमको नियम समझाता है । कहा है तेरा सामन ?
मैं: सर जो वो तो वहा रखा है (कोच के दूसरी साइड इशारा करते हुए मैंने बोला ) ।
R P F का जवान ( ५५ वर्स ) : साले चोरी कर लेगा यहाँ तो कौन जवाब देगा , तेरे जैसे बहुत चोर देखें है हमने । अच्छे अच्छे कपड़े पहन कर चोरी करती है ।
R P F का जवान ( ४० वर्स ) ( दूसरे RPF वाले से ) : दो डंडे दो सही हो जाएगा ।
R P F का जवान ( ५५ वर्स ) : जा जाकर तेरा सामान ले कर आ ।
और मैं उधर से चल दिया , अब उनको इतना विश्वास था कि मैं सामान ले कर ज़रूर आऊंगा । और मैं भी समझ चुका था कि इनको रुपये चाहिए थे ।
मैंने तय कर लिया था कि मैं टी टी को मिलकर टिकट बनवा लूँगा पर इनको पैसा नही दूंगा । मैंने मिलिट्री अंकल के पास जा कर अपना सामन उठाया और उनको बोला मैं टी टी के पास जा रहा हूँ और टी टी को खोजने लगा । अंत मे मुझे टी टी स्लीपर कोच १ पर मिला ।
मैं बड़ी ही शालीनता से टी टी को .................
मैं: सर मेरे पास ये टिकट है ( अपना सूरत तक का टिकट दिखाते हुए ) आप प्लीज़ इसको वडोदरा तक बढ़ा दीजिए ।
टी टी : पर क्यों?
मैं: सर जी मुझे वडोदरा तक जाना है ।
टी टी : पर ये तो ऐ सी का टिकट है , इसको नही बढ़ा सकता ऐ सी से ही बढेगा ।
मैं: तो मैं क्या करूँ।
टी टी : क्यों? क्या प्रॉब्लम है ।
मैं: वो कुछ RPF के जवान परेशां कर रहे है ।
टी टी : तुम्हारा सामान कहा है ।
मैं: सर बस इतना ही है ( समान कि तरफ़ इशारा करते हुए मैं बोला)
टी टी : तुम मेरे साथ आ जाओ , कोई कुछ नही बोलेगा।
मैं: ठीक है ।
टी टी : ऊपर जाकर सो जाओ ( उसने ऊपर कि बर्थ कि तरफ़ इशारे के के साथ बोला)
मैं: ओ के , पर मैं कैसे जनुगा कि वडोदरा आ गया ।
टी टी : मैं तुमको जगा लूँगा ।
मन ही मन मैं सोचने लगा कि टी टी कितने रुपये लेगा , और निष्कर्ष निकला कि १०० रुपए तो जरुर ही लेगा।
अब ट्रेन भरूच स्टेशन तक पहुँच चुकी थी , ट्रेन स्टेशन पर खड़ी ही थी मुझे कुछ जनि पहचानी आवाज़ सुनाई दी । उन्ही RPF के जवानों की ।
एक जवान दूसरे से (शायद कम उम्र वाला ज्यादा उम्र वाले से ) : लगता है लड़का उतर गया ।
दूसरा : हाँ उतर ही गया होगा ।
पहला : ज्यादा डरा दिया लगता है उसको ।
दूसरा : जाने दो सर कोई और मिल जाएगा ।
तभी टी टी जी भी वहीँ आ गए , और मैंने ऊपर से चुपके से नीचे देखा ।
R P F का जवान ( ५५ वर्स ) : साहब ( टी टी से ) एक लड़का था बिना टिकट लगता है उतर गया ।
टी टी : अच्छा ।
R P F का जवान ( ५५ वर्स ) : हम यहीं बैठ जाए।
टी टी : हाँ बैठ जाओ , पर एक सीट छोड़ देना वडोदरा से नया टी टी आएगा ।
R P F का जवान ( 40 वर्स ) : ठीक है वो तो छोड़ देंगे ।
R P F का जवान ( ५५ वर्स ) : हाँ एक सीट छोड़ देंगे ।
और इसके बाद टी टी कहीं चला गया । तभी वहां एक बुड्डा आदमी आ गया ।
R P F का जवान ( ५५ वर्स ) : टिकट है ।
बुड्ढा : नही साहब बस यहीं आनद तक जाना है ।
R P F का जवान ( ४० वर्स ) : तो क्या ऐसे ही जाओगे बाबा ।
बुड्ढा : नही साहब आप जैसे कुछ अच्छे लोग मिल गए है साथ मे चले जायेगे ।
R P F का जवान ( ४० वर्स ) : चलो कुछ मेहनताना तो दे दो जाने का ।
बुड्ढा ( जेब से ५० की नोट निकलते हुए) : साहब बस यही है रख लो। आप जैसे देवता मिल जाते है तो काम हो जाता है ।
R P F का जवान ( ५५ वर्स ) : हम तो हैं ही जनता की सेवा के लिए ।
तभी टी टी भी आ गया और मुझे आवाज़ दी ।
टी टी : बेटा नीचे आ जाओ ।
मैं: वडोदरा आ गया क्या?
टी टी : हाँ बस आ ही गया ।
मैं: ओ के ।
और मैं नीचे आ गया , और मेरे नीचे उतरने के साथ ही ...............
R P F का जवान ( ५५ वर्स ) : सर यही लड़का है बिना टिकट ।
टी टी ( झल्लाते हुए) : कौन कहता है ये बिना टिकट है , और तुम कौन होते हो टिकट देखने वाले ।
(मेरी तरफ़ देखते हुए टी टी ) बेटा बैठों तुम किसी से डरने की जरुरत नही है ।
और मैं उन दोनों RPF के जवानों के बीच मे बैठ गया ।
कुछ देर मे टी टी टॉयलेट चला गया और उन दोनों को मौका मिल गया।
R P F का जवान ( ५५ वर्स ) दूसरे से : सब तुम्हारी वजह से हुआ है कह था मत चड़ने दो इसको ।
R P F का जवान ( ४० वर्स ) : हाँ , ..... ( मेरी ओर देखते हुए) कितना दिया है टी टी को ।
मैं: कुछ नही ।
R P F का जवान ( ५५ वर्स ) : कुछ तो दिया होगा या तुम्हारे गाँव का है। या लालू है जिसको चाहेगा उसको बैठायेगा ।

मैं: शायद अच्छे आदमी है।
R P F का जवान ( ५५ वर्स ) : हाँ भाई कुछ दे दिया होगा तुमने तो अच्छे है ही।
तब तक टी टी जी भी आ गए।
टी टी : बेटा वो मेरा बैग उधना और मेरे साथ आ जाओ वडोदरा आ गया ।
ट्रेन ने स्पीड कम कर दी थी , और धीरे धीरे वडोदरा स्टेशन से अंग्रेजी मे एनौन्सेमेंट भी सुनाई देनी लगी थी कि कछ एक्सप्रेस प्लेट फॉर्म नम्बर ३ पर आ चुकी है ।
हम दोनों ( मैं और टी टी जी ) साथ साथ ट्रेन से उतरे और उसके बाद...
टी टी जी : अब तुम बहार कैसे जाओगे, चलो मैं तुम्हे बहार तक छोड़ देता हूँ।
मैं: धन्यवाद् ।
और हम दोनों सीढियों से ऊपर चढाने लगे।
मैं: सर आपका नाम क्या है ।
टी टी जी : क्या करोगे नाम जान कर ।
मैं: सर थैंक यू तो बोल दूँ।
टी टी जी : उसके लिए नाम कि क्या जरुरत है । क्या नाम के आगे पीछे ठनक यू लगना है।
मैं: नही ।
टी टी जी : तो ऐसे ही बोल दो ।
और मैंने उनको थैंक यू बोला और उन्होंने मुझे स्टेशन के बहार तक छोड़ दिया ।
कितना अजीब सा सफर था ये जहा दुनिया का हर रंग देखने को मिला , एक वो टी टी जी भी थे जिन्होंने निःस्वार्थ भावः से मेरी मदद कि और एक वो देश के जवान भी थे जो ख़ुद के जेबे भरने के लिए उनका कर्तव्य भूल गए थे ।
चलते चलते मैंने वडोदरा स्टेशन को टाटा किया और ऊपर वाले का शुकिया ।
और ऑटो पकड़ कर मैं बी ३२, अरविन्द सोसाइटी को निकला पड़ा............














Sunday, November 2, 2008

शाहरुक खान




आज शाहरुक खान जी का जन्मदिन है और सारा हिंदुस्तान या यूँ कह ले की सारे विश्व उनके फैन उनको उनके ४३ वर्ष पूरे होने की बधाई दे रहे है ।

वैसे मैं भी शाहरुक जी का बहुत बड़ा फैन हूँ , और उनको मेरी तरफ़ से भी जनादीन की ढेर साडी बधाइयाँ । विअसे मैंने सर की लगभग सभी फिल्म देखीहै पर उन्होंने मेरे हिसाब से जो बेहतरीन काम इंडस्ट्री के लिए किया है उसका मूल्य चुकाना बॉलीवुड के लिए नामुमकिन है ।

बादशाह खान फर्श से अर्श तक पहुंचे है मेरे हिसाब से फ़िल्म इंडस्ट्री me बिना किसी पहचान वाले के ( god father ) के इस मुकाम तक पहुँचाना उनका determination , passion और hard work को बताता है जो पाने आप मे एक मिसाल है ।

सर आपको इस बात की भी ढेरों बधाइयाँ ।

भगवन करे आप को लम्बी उम्र मिले और आप यूँ ही हमारा मनोरंजन करते रहे ।